होन-शा-जे-शो-नैन

 
यह दूर उपचारक चिन्ह है। इस चिन्ह का प्रयोग हम उस समय करते हैं जब रेकी को समय तथा स्थान से दूर भेजना हो (ठमलवदक ैचंबम ंदक ज्पउमण्)।
जपानी रेकी दर्शन तथा भारती दर्शन की एक शाखा इस तथ्य को मानते हैं कि हमारी पृथ्वी ही नहीं ब्लकि पूरा ब्रह्मांड, जड़, चेतन, एक दुसरे से सुक्ष्म रूप में एक क्रियाशील सूत्र से बंधे हुए हैं। यह एक शक्ति ऊर्जा का प्रवाह है जो समूह जड़ चेतन में विद्यमान है। मनुष्य एक विचारवान प्राणी है, इसके पास ज्ञान शक्ति के साथ बोल चाल (वाणी) की शक्ति भी है। इन कुदरती अनुभुतियों के बल पर मनुष्य भौतिकता को समझता है तथा इस के बे-अन्त सुक्ष्म स्वरूप का निरीक्षण भी कर सकता है।
आधुनिक विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि सारी सृष्टि प्रमाणु या उसके भी छोटे भाग से निर्मित है। यह परमाणु अति तेज गति से अपने पूर्व निर्धारित रास्ते पर चक्रवात घूम रहें हैं। इस सारे खेल में एक सांझ है जो एक दुसरे से अलग होते हुए भी अलग नहीं हैं। यह सांझ ऊर्जा से स्थापित होती है। यह विचार भी है कि ऊर्जा को पदार्थ तथा पदार्थ को ऊर्जा में तबदील किया जा सकता है। ऊर्जा नाशवान नहीं स्वरूप बदलती है। जैसे पहाड़ों से गिरती आबशार से नीचे जो बुलबुले बनते हैं तथा सूरज की रोशनी में हमें सात रंग हमारे भावों से अलग दिखाई देते हैं वास्तव में पानी ही है। पानी तेज गतिशीलता की प्रतिक्रिया का एक स्वरूप् है जो पल पल बदलता रहता है। साथ ही हमें यह सारा ब्रह्मांड एक जैसा लगता है।
अन्त में यह कह सकते हैं हम ब्रह्मांड का अंश मात्र हैं तथा एक-रस हैं।
सिंबल होन-शा-जे-शो-नैन उस ऊर्जा का सम्वाहक है जो हमें भूत तथा भविष्य से जोड़ता है। यह चिन्ह समय व दूरी को मिटाता है। भूतकाल की किसी भी बुरी घटना या हादसे की चोट को रेकी ऊर्जा से भुलाया जा सकता है। हमारे कार्मिक दोषों को मुक्ति प्रदान करवाने में सहायी हो सकता है। हीलर रोगी से इस चिन्ह द्वारा संपर्क स्थापित करता है। रोगी को कार्मिक दाषों के तालों को खोलता हैः
होन(भ्व्छ) का भाव है - आरम्भ
शा (ैभ्।) का भाव है – रोशनी, चमकना जे(र्म्) का भाव है – सही दिशा, मार्ग शो(ैभ्व्) का भाव है – निशाना, गोल (ळवंस) नैन(छ।प्छ) का भाव है – अन्तहकरण तक पहुंचना यह भी विचार है कि यह एक बोधी मंत्र है जो इस प्रकार हैः भ्वद.ै।.र्.ै.छमद मतलब हे ईश्वर! मुझे सभी दोषों (कार्मिक) से मुक्त करो। संस्कृत में यही मंत्र कुछ इस प्रकार है भ्वद.ै।.र्.ै.छ।ड।भ् भाव जो सिरंजनहार, पालनहार तथा संहार करने वाला है, उसका आवाह्यन करता हूँ कि मुझे बचा कर रखना। यह एक पुल है जो हमारा अतीत तथा भविष्य से मेल करवाता है। ऐसे पुल का जिक्र सभी धर्मों में भी है। इस्लाम में इसको सुरात-ई-मुस्तकीन (बाल से भी बारिक), सिख मतानुसार : ‘‘खंनिअहु तिखी (उस्तरे की धार से भी बारिक), बाल-हु-निकी (बाल से भी बारिक) एतु मार्ग जाना।।’’ चाहे विद्यवानों ने इस चिन्ह के अक्षरी अर्थ कई तरह से किये हैं पर रेकी में इस सिंबल का विशेष स्थान है। रोगी चाहे पड़ोस के कमरे में, चाहे दूर अथवा उससे भी दूर हो। संभव हो तो हमें उसकी रेकी के लिए आज्ञा ले लेनी चाहिए अथवा इस उद्देश्य के लिए प्रयत्न करना चाहिए। यदि ऐसा संभव नही ंतो हमें उसकी आत्मा से ब्रह्मांडी शक्तियों द्वारा आज्ञा लेनी चाहिए। यह इस लिए जरूरी है ताकि रोगी की समस्या की तह तक जाया जा सके। यह रेकी नीचे लिखे कार्यों के लिए प्रयोग की जा सकती हैः-
  1. शक्ति संवरधन के लिए
  2. शक्तिपात के लिए
  3. सुरक्षा के लिए
  4. प्रेम या शांति भेजने के लिए
  5. मन को प्रभावित करने के लिए
  6. रोग के ईलाज के लिए
  7. भविष्य में धन, उन्नित तथा अच्छे स्वास्थ्य के लिए
  8. किसी मनोकामना की पूर्ति के लिए एक ओर रेकी विद्यवान (ड।न्भ्त्म्म्छण्श्रण्ज्ञम्स्स्ल्) अनुसार हम इस सिंबल की सहायता से किसी भी समस्या की जड़ अथवा उसके मूल तक पहुंच सकते हैं। उस समस्या की सच्चाई से संचार स्थापित कर सकते हैं। यह सिंबल दो तरह से काम करता है, पहला संबंध बनाना, दुसरा- रास्ता तैयार करना, जिसके द्वारा रेकी सिंबलों को समय तथा दूरी पर संचार किया जा सके। हम सब जानते हैं कि रेकी एक सुख-दायिक ऊर्जा है क्योंकि यह सुख ही प्रदान करती है इसका प्रयोग मन्द-भावनाओं की पूर्ती के लिए नहीं किया जा सकता। ष्क्पेजंदबम भ्मंसपदह ंसूंले ूवतो वित जीम ीपहीमेज हववक वि जीम चमतेवद तमबमपअपदह पजए दवज जीम चमतेवद ेमदकपदह पजएष् ध्यान योग्य बातेंः जहां तक हो सके हमें यह पक्का कर लेना चाहिए कि जिस व्यक्ति को दूर-संचार रेकी भेजनी है वह उस समय कोई काम ना कर रहा हो। क्योंकि रेकी के समय रोगी को सुख का अहसास होता है, हो सकता है रोगी को नींद ही आ जाए। यदि रोगी से संपर्क हो सकता हो तो अच्छा है, नहीं तो उसे उसको निम्नलिखित अव्स्थाओं में होना चाहिएः
  9. सब से बढ़िया होगा कि रोगी सोया हो।
  10. दुसरी अच्छी अवस्था होगी कि रोगी आराम से लेटा हुआ हो।
  11. तीसरी अवस्था यह है कि आराम कर रहा हो। यदि हमारा रोगी से संपर्क संभंव नहीं है तो रेकी करते समय, संबंध स्थापित होने के बाद यह कमांड देनी चाहिए कि यह रेकी रोगी (उसका नाम लेकर) को उस समय प्राप्त हो जब वह सो ले रहा हो।
दूर उपचार करने के ढंग
  1. यदि हमने व्यक्ति को देखा हो तो उसकी शक्ल/चेहरा याद करके।
  2. यदि रोगी व्यक्तिगत तौर पर नहीं मिला हो तो उसकी फोटो पर रेकी की जा सकती है।
  3. यदि तस्वीर ना हो तो उसके द्वारा किये गये हस्ताक्षर (ैपहदंजनतम) पर तस्वीर के जैसे रेकी भेजी जा सकती है।
  4. ऊपर बताई तीनों बातों में यदि कुछ भी संभव ना हों तो उसका नाम, उसके पिता का नाम तथा जहां वह रहता है उस स्थान का पूरा पता ;।ककतमेद्ध पर्ची के ऊपर लिख कर फिर पर्ची की चार या आठ तहें करके तस्वीर की भांति रेकी भेजी जा सकती है। रेकी भेजने के लिएः
  5. शक्ल याद करके : दोनों हाथ आसमान की तरफ करके रेकी का आवाह्मन करो ‘‘ हे रेकी उर्जा मेरे हाथों से प्रवाहित हो, तीन बार कहें।दोनों हाथ जोड कर प्रार्थना करो : ष्हे ब्रह्मांड की सारी दिव्य शक्तियों मैं …… (रोगी का नाम लेकर) की रेकी करने जा रहा हूँ कृप्या मेरी मदद करो मुझे रास्ता दिखाओं, मुझे सुरक्षा प्रदान करो ताकि मैं ………. (रोगी का नाम लेकर) की दूर-उपचार रेकी अथवा रेकी कर सकूं। ;तीन बार कहना हैद्धष्
  6. अपने दोनों हाथों को चो-कु-रे सिंबल के प्रयोग से शुद्ध करो (च्नतपलि), चार्ज करो (ब्ींतहम) तथा चो-कु-रे स्थापित करो।
  7. बायें हाथ पर दायें हाथ से तिकोण बनायें।
  8. दोनों हाथों तथा बाजुओं को खोल कर (हाथों में फासला 1 अथवा 1) फुट का होना चाहिए) आकाश की ओर करके, आँखें बन्द करके रोगी की फोटो अपने दोनों हाथों में महसूस (अपेनंसप्रम) करो, फिर इस फोटो को अपने बायें हाथ में बनाई तिकोण में स्थापित हुई महसूस करो। उस मनुष्य की शक्ल को अपने बायें हाथ ऊपर बनाए तिकोण में महसूस करो, और कहो ‘‘…………. मैं आपका दूर उपचार ;क्पेजंदबम भ्मंसपदहद्ध करने जा रहा हूँ कृप्या मेरे हाथों में विराजमान हां। (इस बात को तीन बार कहो) उसके माथे ऊपर 3$2$1 (होन-शा-जे-शो-नैन $ से-हे-की $ चो-कु-रे)(भ्वद.ैं.र्म.ैव.छंद ़ ैमप.भ्मप.ज्ञप ़ ब्ीव.ज्ञन.त्म) तीनों सिंबल बारी बारी से बनाओ और हर बार तीन-तीन बार नाम लो, दायां हाथ बायें हाथ ऊपर रखो ओर दोनों हाथों को अनाहत चकरा ;भ्मंतज ब्ींतंद्ध के पास लेकर आओ। फिर बोलो (रोगी का नाम) जी अब मेरा संबंध आपके साथ स्थापित हो गया है मैं आपकी रेकी करने जा रहा हूँ। कृप्या मेरी रेकी स्वीकार करो।
  9. ध्यान देने योग्य बात यह है कि क्पेजंदबम रेकी ब्वउउंदक में, करो है, करो है, करो है नहीं कहना ब्लकि ‘‘हो गया है, हो गया है, हो गया है’’ कहना है। यह कमांड च्तमेमदज च्मतमिबज ज्मदेम में ही देनी है। ;ंद्ध जैसे नीचे दिये उदाहरण में विक्की जी के सिर में दर्द है तो थर्ड आई की रेकी करनी है, साथ में यह कहना है कि विक्की जी का थर्ड आई चक्रा चार्जड है, पोजिटिव है, कलरफुल है, एकटीवेटिड है, बिल्कुल ठीक है, विक्की जी के सिर का दर्द बिल्कुल समाप्त हो गया है, दिमाग रिलैक्सड है, थर्ड आई चॅक्र बिल्कुल ठीक है। इन बातों को कम से कम 20-25 मिनट तक लगातार बार बार कहते रहना है। ;इद्ध यदि आप किसी और रोगी की क्पेजंदबम रेकी कर रहें हैं और उसे कोई ओर बिमारी है तो उस बिमारी संबंधी चक्र की रेकी करनी है। यदि आपको उस बिमारी संबंधित चॅॅक्र की जानकारी नहीं है तो चक्र का नाम नहीं लेना चाहिए तथा बिमारी के ठीक होने की कमांड ही देनी है। जैसे कि ‘‘मनीष का पैनक्रिया ठीक काम कर रहा है, यह सही मात्रा में इन्सुलीन बना रहा है। मनीष जी की शुगर नार्मल हो गयी है आदि।
  10. धीरे धीरे दायें हाथ को बायें हाथ के ऊपर घुमाते हुए रेकी भेजें। संबंधित चक्र चार्जड है, पोजिटिव है, कलरफुल है, एकटीवेटिड है, बिल्कुल ठीक है, बिमारी समाप्त हो गयी है, दिमाग रिलैक्स है, चक्र बिल्कुल ठीक है। (इन बातों को कम से कम 20-25 मिनट तक लगातार बार बार कहते रहना है।) तथा अंत में यह कह कर स्थापित करो कि ‘‘मैं इस रेकी को लगातार उपचार के लिए स्थापित करता हूँ (तीन बार कहो) स्थापित हो, स्थापित हो, स्थापित हो।
  11. इसके उपरान्त दायें हाथ को बायें हाथ के ऊपर से हटा कर बायें हाथ की तरफ देख कर तीन बार बोलो मैंने आपकी रेकी कर दी है – कृप्या अपनी जगह पर वापस जायें तथा दोनों हाथ पहले की तरह आकाश की तरफ करके बोलो ‘‘आप अपने स्थान पर वापस जायें’’ं, (तीन बार कहो) तथा उसको आकाश में छोड़ दो। बल्लैस तथा कट करो (बल्लैस तथा कट जरूर करना है।) (ठसमे – ब्नज) (तीन बार करो।) तीन बार धन्यवाद करो।

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