सिंबल ध्यान

शारीरिक मानसिक तथा अध्यात्मिक शक्तियों को जागृत करने के लिए सिंबल ध्यान (ैलउइवस डमकपजंजपवद) बहुत जरूरी है। ऐसे ध्यान के लिए यह जरूरी है कि जहां बैठ कर हमने क्रिया करनी है वहां बहुत ही शांत वातावरण होना चाहिए तथा किसी भी तरह से ध्यान न भटके अथवा शोर शराबा ना हो ताकि एकाग्रता में किसी तरह का विघ्न ना पड़े। प्रक्रियाः
  1. सुखासन में या कुर्सी पर इस तरह बैठना चाहिए कि रीढ़ की हड्डी सीधी रहे। आराम की मुद्रा तथा आँखें बंद हों।
  2. वातावरण को शांत करने के लिए बहुत ही धीमे स्वर में संगीत बजता हो तो ठीक रहेगा। आसन के स्थान पर हल्की सी रोशनी भी होनी चाहिए।
  3. हाथ जोड़ कर ईश्वर का ध्यान करो। मन में तीन बार कहोः हे ईश्वर! मैं ध्यान करने जा रहा हूँ/रही हूँ, रेकी ऊर्जा की शारीरिक, मानसिक तथा अध्यात्मिक तीनों दिव्य शक्तियों को मेरे अन्दर प्रकाशमान करो ताकि मैं आपकी तरह सर्वशक्तिमान हो ‘‘अपनी आत्म-पहचान’’ कर सकूँ।
  4. अपना सारा ध्यान श्वास क्रिया पर लगाते हुए, श्वास को लयबद्ध करो।
  5. सिर से लेकर पैरों तक सारे अंगों की ओर ध्यान लगाओ तथा हर अंग को ढीला तथा शिथिल अवस्था में लाओ।
  6. शरीर के शिथिल होने पर श्वास क्रिया को धीमा करो, इससे मन शांत हो जायेगा।
  7. अब अल्फा लेवल के लिये कल्पना करो कि आप एक छत पर खड़े हैं और 13 से 1 तक उल्टी गिणती करते हुए गोलाकार सीढ़ियों से नीचे की ओर आ रहे हो तथा अपने इष्टदेव के मन्दिर में अपने इष्टदेव के सामने बैठे हो, अपना सारा ध्यान सहस्त्रार चक्र (ब्तवूद ब्ींांतं) पर ले जाओ तथा जामनी/बैंगनी रंग के खिले कमल के फूल की कल्पना करो (अपेनंसप्रम)।
  8. चो-कु-रे सिंबल का आवाह्य करो। यह कल्पना करो कि आप के सहस्त्रार चक्र के कमलफूल में से उज्ज्वल तथा चमकदार रोशनी का धुंआ सहस्त्रार से मूलाधार तक हर चक्र को निर्मल, शुद्ध तथा तेज्सवी करता हुआ मूलाधार चक्र पर स्थापित हो गया है। यह प्रार्थना भी करोः ‘‘हे चो-कु-रे ऊर्जा मेरे अन्दर प्रवाहित हो तथा मेरे शरीर के अणु अणु को शुद्ध, स्तेज व शक्तिमान बनाओ’’ यह महसूस करो कि आपके शरीर के रोम रोम में से सारी गन्दगी चो-कु-रे द्वारा शुद्ध की जा रही है। सारा शरीर नयी शक्ति तथा ऊर्जा से प्रफुलित हो रहा है।
  9. अब से-हे-की सिंबल का आवाह्य करो फिर प्रार्थना करो ‘‘हे से-हे-की ऊर्जा मेरे अन्दर प्रवाहित होकर मेरे मन और भावना को संतुलित करो, मेरे अन्दर प्रेम, करूणा, मैत्री का संचार करो।’’ से-हे-की को गुलाबी रंग में अपने सहस्त्रार चक्र से लेकर मूलाधार चक्र तक हर चक्र को संतुलित करते हुए, प्रेम, करूणा का संचार करते हुए मूलाधार पर स्थापित करो। महसूस करो कि हमारा सारा शरीर गुलाबी रंग के धुएं में नहाया हुआ है।
  10. अब आप शरीर तथा मन से शुद्ध, शक्तिमान और प्रेम से भर गये हो। आप सभी ब्रह्मांडी दिव्य शक्तियों को ग्रहण करने के योग्य बन गये हो, अब अपने सहस्त्रार चक्र पर सिंबल होन-शा-जे-शो-नैन का आवाह्य करो। तीन नंबर सिंबल को सहस्त्रार चक्र से मूलाधार चक्र तक जाते देखो। यह महसूस करो कि आपके सहस्त्रार चक्र का ब्रह्मांड की सभी दिव्य शक्तियों से संबंध स्थापित हो गया है। प्रार्थना करो ‘‘मैं अपने गुरू महाराज एवं सभी पवित्र आत्माओं का आवाह्य करता हूँ, मेरे अन्दर प्रवाहित हों, मुझे अपने जैसा शक्तिमान, पवित्र, प्रेम पूर्ण तथा दिव्य दृष्टि से प्रीपूर्ण करो ताकि मैं सारे संसार के प्राणीयों तथा विश्व का कल्याण कर सकूं। यह महसूस करो कि ब्रह्मांड से सुनिहरे रंग की ऊर्जायें तथा शक्तियां आपके भीतर प्रवाहित हो रहीं हैं तथा आप ईश्वर से एक रूप होकर शक्तिशाली तथा प्रेमपूर्ण हो गये हैं। इस संपर्क को हर समय महसूस करते हुए आनन्दमयी हो जाओ। अपने आपको ईश्वर से लीन होकर, दिव्य शक्तिवान महसूस करते हुए, धीरे धीरे सांस भरते हुए चेतना में वापिस आओ। ईश्वर, गुरूओं तथा बजुर्गों का धन्यवाद तथा आभार प्रगट करते हुए आँखें खोलो। इस तरह ध्यान को नियमित करने से हम रेकी के तीनों सिंबलों के अद्भुत प्रभाव का लाभ लेकर अपने मन, शरीर तथा आत्मा की सभी शक्तियों को जगा सकते हैं।

Leave a Reply

X