रेकी सिंबल Reiki Symbol

रेकी के सिंबल पवित्र होते हैं, इनकी पवित्रता को ध्यान में रखते हुए इनको गुप्त रखा जाता है। यह एक परम्परा है जिसे हम आदर सहित ग्रहण करते हैं। यह चिन्ह उन व्यक्तियों को प्रदान किये जाते हैं जिन्होने रेकी की पहली और दुसरी डिग्री (के अनुरूप कार्यशैली) की सुसंगतता प्राप्त की होती है। केवल दीक्षा प्राप्तकर्ता ही इन प्रतीकों का सही और शुद्ध प्रयोग कर सकता है। शक्तिपात (सुसंगतता) मुख्यतः तीन चिन्हों का समवाहक बनता है।
  1. ऊर्जा चिन्ह (Power Symbol)
  2. मानसिक ओर भावनात्मक चिन्ह (Mental Healing Symbol)
  3. दूर उपचार चिन्ह (Distance/Absentee Symbol) आधुनिक युग में जब कि हर प्रकार का ज्ञान कम्पयूटर और नैट्ट पर उपलब्ध है, इन सिंबलों की जानकारी सहज ही प्राप्तयोग है। अब प्रश्न यह पैदा होता है कि यदि ऐसा है तो दीक्षा प्राप्ति (Attunement/Intiation) की क्या आवश्यकता है। दीक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जिस से एक शिष्य अपने रेकी गुरू से मानसिक/भावनात्मक तथा बौधिक स्तर पर एक सम होता है तथा रेकी की प्रक्रिया का चक्र सम्पूर्ण कर पाता है। चाहे हम अपने स्तर पर कितना ही ज्ञान प्राप्त कर लें, दीक्षा प्राप्त किये बिना अधूरा ही नहीं अर्थहीन है। दीक्षा के बाद शिष्य की रूचियां एक लय में बंध जाती है। गुरू बायें और दायें दिमाग को सम कर उनमें ऊर्जा का संचार करता है। यह एक ऐसा तथ्य है जिसको आज दिन तक झूठलाया नहीं जा सका है। ज्ञान का दीपक तभी जलता है यदि उसमें तेल है। दीपक में तेल का अभिप्राय शक्तिपात है जो रेकी के दीपक को जलाता है तथा शिष्य को प्रकाशमय करता है। भाव यह कि रेकी चिन्हों की जानकारी शक्तिपात (दीक्षा) के बिना प्रभावहीन और निरर्थक है और अन्धेरे में सिर पटकने के समान है। रेकी हमारे अर्द्ध-चेतन मन को प्रभावित करती है। दीक्षा प्राप्त चिकित्सक जब रेकी सिंबल का आवाह्य करता है तो रेकी ऊर्जा क्रियाशील होती है, ऐसा होना अनिवार्य है क्योंकि सिंबल, परमात्मा और रेकी-चिकित्सक के बीच एक पवित्र वचन (वाइदा) होता है। यह एक चाबी है जो ज्ञान दृष्टि के उच्च दर्शन को खोलती है। चिन्ह (Symbol) को जागृत करने के लिए उनको ठीक तरह से बनाना और प्रयोग करना आवश्यक है। चेतन मन को अवचेतन या अर्द्ध-चेतन मन के साथ जोड़ने के लिए सिंबल एक सश्क्त माध्यम है। पढ़ने या सोचने की बजाये इसे महसूस करना अधिक उपयोगी है। इस स्तर पर हमें तीन सिंबलों का ज्ञान दिया जाता है। इनका प्रयोग अनुशासन से करने से उच्चतम अध्यात्मिक परिणाम वाली तरंगें पैदा होती हैं। चिन्हों को हाथ या तीसरे नेत्र के साथ बनाया जाता है तथा चिन्ह का नाम धीरे या ऊँचे स्वर से तीन बार लिया जाता है। अपरिचित शक्तियाँ जागृत हो जाती हैं। जरूरी यह है कि अभ्यासकर्ता इनके लिए श्रद्धावान हो। चिन्ह शरीर पर या शरीर से दो-तीन इंच ऊपर, उंगलियों अथवा हथेलियों की सहायता से बनाये जाते हैं, उपरंत तीन बार चिन्ह का नाम पुकारा जाता है तथा हाथ की ठीक स्थिति बनाकर रेकी दी जाती है। यह बहुत आवश्यक है कि रेकी देने की प्रक्रिया के समय हमारे हाथों की उंगलियां आपस में जुड़ी हो।

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