रेकी में आदान-प्रदान का भाव

इधर-उधर की या घुमा फिरा कर बात करने की बजाये, सीधी बात ये है कि क्या रेकी, बदले में कुछ प्राप्त किये बगैर दी जा सकती है। अर्थात, यदि हम किसी का उपचार करते हैं तो इसके बदले में हमें क्या प्राप्त होगा। इस विचार के संबंध में रेकी साहित्य में बड़ा कुछ कहा और लिखा गया है। बात स्पष्ट यही है कि रेकी यूं ही नहीं मिलती इसके लिए हमें कुछ तो चुकाना ही होगा। इस विचार का बहुत ही यर्थाथवादी उत्तर डा. मिकाओ उसई के जीवन से ही हमें भली भांति मिल जाता है। उन्होंने जब भिखारियों का रेकी उपचार शुरू किया तो भिखारी शारीरिक रूप से तो स्वस्थ हो गये थे परन्तु मानसिक और भावनात्मक स्तर पर उनका बौधिक विकास अधूरा रहा। इस घटना के बाद ही डा. उसूई ने केवल उन लोगों को ही रेकी की शिक्षा दी जो लोग रेकी के महत्व को समझने लगे थे और इसकी प्राप्ती के लिए वह बौधिक स्तर पर परिपक्व थे तथा आभारी भी थे। भिखारी ना तो परिपक्व थे, ना आभारी, ना आध्यात्म से उनका कोई लेना देना था। हम सभी जानते हैं कि बिना किसी उपराले के मिली हुई प्राप्ती का भावनात्मक मुल्य ना के बराबर होता है। जब हम कुछ प्राप्त करने के लिए अपनी बौधिकता के तराजु में कुछ अदा करते हैं तो उस प्राप्ती का मुल्य अर्थपूर्ण होता हे। जैसे रेगिस्तान में पानी का मुल्य। अनपढ़ को अक्षर बोध होना आदि। अब प्रश्न ये उठता है कि रेकी के आदान-प्रदान में पैसे का क्या मुल्य है। आज के बदले प्रीवेष में आर्थिक आवश्यकताओं से हम सबका पाला पड़ता है तो क्या रेकी को बीच बजार में बेचा जाये। यदि ऐसा है तो उन महा-अनुभावों का क्या होगा जिनका जीवन लक्ष्य समाज सेवा ही है या वो जिनका व्यवसाय रेकी है। इस सदर्भ में हमें महात्मा बुद्व को नहीं भूलना चाहिए उन्होने हर समस्या के लिए ‘‘मध्य मार्ग’’ का चयन किया। यानि आर्थिक समस्या के लिए पैसे की कमाई करो परन्तु किसी की मजबूरी को ना भूलो। जर्मन के प्रसिद्ध गरैंड-मास्टर फराॅक अरजावा पीटर ने अपनी किताब त्मपाप थ्पतम के पन्ना नं. 40 पर लिखा है (।े ं तनसमए प् ूवनसक ेनहहमेज लवन दवज वििमत त्मपाप ैमेेपवदे जवव तिममसल ंदक दवज ूपजीवनज ेवउम ापदक व िबवउचमदेंजपवद ूीपबी कवमे दवज ींअम जव इम उवदमल) इस भावना का ये अर्थ भी नहीं कि हम अपने प्रियजनों को भूल जायें। हमारे स्नेहीजन, प्रिय-जन, जिन से हम भावनात्मक स्तर पर जुड़े हैं, पर ये नियम लागू नहीं हो सकता क्योंकि इन प्रियजनों से हमारा भावनात्मक आदान-प्रदान सदैव बना रहता हैं। यही नियम समाजिक स्तर पर भी लागू होता है अर्थात जब सेवा-भाव से समाज के लिए अपने बहु-मुल्य समय में से कुछ करना चाहते हैं जैसे महीने के नियमत दिनों के लिए निशुल्क रेकी कैंपों का आयोजन करना। ऐसे अनुभवों का जीवन में अपना स्थान है। हम समाजिक प्राणी हैं। हर वस्तु या कार्य को हर समय तौल कर उसका मुल्य हम नहीं लगा सकते। डा. उसूई की उदाहरण देते हुए मोरीन.जे.कैली (डंनतममदण् श्रण् ज्ञमससल) अपनी पुस्तक (त्मपाप ।दक जीम भ्मंसपदह ठनकीं) में लिखती हैं (डपांव न्ेनप बंउम जव जीम बवदबसनेपवद जींज जीमतम दममकमक जव इम ंद मदमतहल मगबींदहम ेव जीम हपजि व ित्मपाप ूवनसक इम ंचचतमबपंजमक), इस प्रीपेक्ष को उन्होनें ठनकीं भ्मंसपदह सूत्र का हवाला देते हुए ‘‘उपहार’’ (ळपजि) का वर्णन किया है कि ब्रंह्मांड में ऊर्जा का आदान-प्रदान प्राकृतिक नियम से होता रहता है। इसी की रूप रेखा में हम समाजिक बंधनों में बंधे हैं। व्यक्तिगत सोच-विचार का अपना मुल्य है।

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