रेकी दीक्षा

यह गुरू शिष्य के बीच की पारम्परिक विधि है। इसे शाक्तिपात करना भी कहते हैं। रेकी आज के प्रसंग में पढ़ाई की रूपरेखा से भिन्न है। साधक रेकी मास्टर के पास जाता है तब भी संभव है अगर साधक रेकी मास्टर से दूर स्थान पर है तब भी संभव है। रेकी का एक नियम ‘‘ऊर्जा का आदान प्रदान’’ है अर्थात यदि आप मुझे कुछ देते हैं और मैं आत्मिक भाव से उसे प्राप्त करता हूँ तो मेरा कतर््ाव्य है कि मैं भी उसी भाव से आपको आदरसहित कुछ प्रदान करूं। शिष्य क्योंकि शक्तिपात के लिए मुक्त-भावी है, वह रेकी मास्टर या गरैंड मास्टर को दीक्षा के लिए, गुरू-दक्षिणा के रूप में कुछ प्रदान करता है। आज के बदले परिवेश में धन ही प्रधान है अर्थात शिष्य एक निर्धारित राशि गरैंड मास्टर को देता है और बदले में शक्तिपात प्राप्त करता है। परन्तु यह भी एक तथ्य है कि जहां गुरू में सम्र्पण की भावना होती है वहां शिष्य भी मुक्त भाव से गुरू के समक्ष इस ईश्वरीय शक्ति को प्राप्त करने के लिए तन,मन और धन से इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए उत्सुक होता है। यह एक आलौकिक अनुभव है जिसे आप जीवन में एक बार ही प्राप्त करते हैं। यह भी देखा गया है कि रेकी के कई प्राथमिक अनुयायी एक से अधिक रेकी गुरूओं से दीक्षा लेते थे। यदि रेकी मास्टर या गरैंड मास्टर अपनी कला में परवीण है तो वह अपने शिष्यों को रेकी के सब पहलुओं से जागरूक कराता है। शक्तिपात के बाद गुरू और शिष्य में एक खास संबंध स्थापित हो जाता है। गुरू अपने शिष्यों की उत्सुकता को यथासंभव समझने का प्रयत्न करता है, उस संबंधी सभी प्रश्नों के उतर देता है, रेकी की दिनचर्या की कार्यशैली के बारे में बताता है, समय समय पर पैदा हाने वाले विचारों पर रोशनी डालता है। सुसंगतता (।जजनदमउमदजध्प्दपजपंजपवद) या रेकी की दीक्षा कैसे काम करती है, इसके मनोविज्ञानिक तथ्य परामनोविज्ञानिक कारण क्या हैं, बताया नहीं जा सकता। केवल महसूस किया जा सकता है। बहुतात दीक्षा प्राप्त कर्ताओं का यह मानना है कि यह एक विलक्षण अनुभव होता है। हर शिष्य का अपना अनुभव होता है। यह एक गुप्त विधि है, शिष्य को भी इसकी बारिकियों में नहीं जाना चाहिए। यह उसके क्षेत्र के बाहर का विषय है। उसका ध्यान केवल और केवल पहली और दुसरी डिग्री के शक्तिपात की ओर ही होना चाहिए और इस अनुभव का आनन्द प्राप्त करना उसकी वृत्ति में हो तो बेहतर होगा। मोटे तौर पर शिष्य को एक कम रोशनी वाले कमरे में, मुक्त भाव से हाथ जोड़ कर, आँखें बंद करके पूर्ण आराम की मुद्रा में कुर्सी पर बैठाया जाता है, गुरू शिष्य के साथ ध्वनियों और स्पर्षों से संबंध स्थापित करता है। ब्रह्मांडीय ऊर्जा को शिष्य में प्रवाहित करता है, उसके सातों चक्रों का भेदन कर उनको खोलता है, सक्रिय करता है, और संतुलित करता है। इस प्रक्रिया में शिष्य के आभा-मण्डल में भी बदलाव आता है, आभा मण्डल फैल कर अधिक प्रकाशमान हो जाता है। गुरू ज्ञान का वाहक है, शिष्य पात्र तथा प्राप्त करता है। दीक्षा उपरान्त शिष्य गुरू के चरण सपर्श करता है, अपनी आस्था और श्रद्धा उसके प्रति प्रगट करता है। गुरू यशस्वी होने का आर्शिवाद देता है। अब रेकी जीवन भर शिष्य के साथ रहेगी, वह इसका किस तरह और कैसे उपयोग करता है, यह केवल उसकी का अधिकार होगा। शक्तिपात की प्रक्रिया संपूर्ण होने के बाद शिष्य को प्रतिदिन का कार्यक्रम समझाया जाता है। उसको पहले सिंबल चो-कू-रे, जिसे शक्ति सिंबल (च्वूमत ैलउइवस) भी कहते हैं के प्रतिरूप के बारे में बताया जाता है। 21 दिनों तक इस सिंबल का अभ्यास करने की प्रक्रिया से अवगत कराया जाता है। इस अभ्यास की विस्तृत जानकारी इस पुस्तक के पन्ना नं.— से पन्ना— दिनचर्या के हिसाब से दी गयी है। उसे चक्रों के ज्ञान के बारे में भी समझाया जाता है। प्रत्येक चक्र पर रेकी के शक्ति सिंबल (च्वूमत ैलउइवस) चो-कू-रे के अभ्यास के बारे में जानकारी दी जाती है। आभा मण्डल की संगरचना, उसके रंगों, के बारे में भी बताया जाता है। आभामण्डल को साफ करने की क्या प्रक्रिया है, कितने प्रकार हैं, यह सब सुचारू रूप से व्याख्या के साथ, उदाहरण देकर बताया जाता है। इसके अतिरिक्त पानी को कैसे चार्ज करना है, दूसरे की रेकी करने के बाद या किसी दूसरे के लिए पानी चार्ज करने के बाद ठसमेे – बनज करना होता है, इसका क्या अभिप्राय है, यह कैसे किया जाता है, के बारे में भी व्याख्या सहित बताया जाता है। 21 दिन के बाद दूसरे सिंबल से-हे-की के प्रतीरूप पर रोशनी डाली जाती है। यह सिंबल भावनाओं की संतुलता के लिए प्रयोग किया जाता है, इसकी विस्तृत जानकारी और अभ्यास की दिनचर्या पन्ना– से पन्ना–पर विस्तार से की गयी है। यह सिंबल व्यक्ति की भावनाओं को सम करने के लिए तीन चक्रों, आज्ञा (ज्ीपतक म्लम) चक्र, अनाहित (भ्मंतज)चक्र, मणीपुर (ैवसंत च्समगेने) चक्र पर ही प्रयोग होता है। सुरक्षा कवच बनाने का ढंग और कनपटी क्षेत्र पर रेकी करने का ढंग भी बताया जाता है। इच्छापूर्ति के लिए की जाने वाली प्रक्रिया, बायें और दायें दिमाग को संतुलित करना भी इसी पाठ्य क्रम का हिस्सा है। अगले 21 दिन के बाद तीसरा सिंबल होन-शा-जे-शो-नैन को बनाने की विधि और इसके उपयोग को समझाया जाता है। यह दूर उपचार का सिंबल है इसलिए रेकी में इसका एक विशेष स्थान है। दूर उपचार कैसे और किन हालात में किया जाता है, भूत में घटित हुई या भविष्य में होने वाली किसी भावी घटना की रेकी का हाल और विस्तृत जानकारी इस पाठ्य क्रम का हिस्सा है। बंदित करना, इसका अभिप्राय और ढंग सभी इसी सिखलाई का हिस्सा है। एक और दो लैवल की डिग्री का सम्पूर्ण अभ्यास कुल 63 दिन का है। उपरान्त इच्छुक रेकी उपचार करने के योग्य हो जाता है। वह स्वयं अपनी, अपने प्रियजनों की रेकी मुक्त भाव से करके लाभ प्राप्त कर सकता है।

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