रेकी के पांच स्तम्भ

रेकी रूपी भवन, जिसकी नींव आत्मिक और शिखर ब्रह्मांड है, पांच सत्मंगों पर निहित है। डा. मिकाओ उसूई ने स्वयं आप इन नियमों का पालन किया और हमारे लिए एक निधि के रूप में विरासत में छोड़ा। ये पाँच नियम हैः- 1ण् केवल आज के लिए मैं सब के प्रति कृतज्ञ भाव रखूंगा। 2ण् केवल आज के लिए मैं चिंता नहीं करूंगां। 3ण् केवल आज के लिए मैं क्रोध नहीं करूंगां। 4ण् केवल आज के लिए मैं अपने माता-पिता, गुरूओं (अध्यापकों)और बजुर्गों का सम्मान करूंगां। 5ण् केवल आज के लिए मैं अपनी जीविका पूर्ण ईमानदारी से अर्जित करूंगां। प्रसिद्ध मनोविज्ञानी अलफर्ड जंुग ने कहा है कि भय, चिंता, क्रोध, ईष्र्या लोभ आदि का बहुतात में होना शारीरिक और मानसिक रोगों का कारण बनता है। यदि इन रूचियों का दमन किया जाये तो भी रोग पैदा होते हैं। यही बेहतर है कि स्वस्थ और सुखी जीवनशैली के लिए इन वेगों को पैदा ही ना होने दिया जाये। डा. जुंग के इस विचार के प्रीपेक्ष में डा. मिकाओ उसूई द्वारा अपनाये गये रेकी के पांच सत्मंग कितने अर्थपूर्ण है, इसका अन्दाजा आप खुद लगा सकते हैं।
  1. केवल आज के लिए मैं सबके प्रति कृतज्ञ भाव रखूंगां अर्थात मैं सब का धन्यवादी हूँगा। कई विद्यवानों ने इसे ।जजपजनकम व िळतंजपजनकम भी कहा है। भाव हमारा व्यवहार ही कृतज्ञता का होना चाहिए। रेकी की दिनचर्या से पहले हमें इस भाव से दिन शुरू करना चाहिए। मैं अपने लिए कृतज्ञ हूँ कि मैं यहां हूँ। मैं रेकी ऊर्जा का कृतज्ञ हूँ कि वह मुझ में प्रवाहित हो रही है, मैं डा. मिकाओ उसूई का कृतज्ञ हूँ, मैं अपने रेकी गुरू गरैंड मास्टर का कृतज्ञ हूँ कि जिन के कारण मैंने रेकी कला को सीखा और उपचारक बना। इसी प्रकार हमारा अपना अस्तित्व, हम क्या हैं, क्यों हैं, किस लिए है आदि के लिये कृतज्ञता प्रगट करना सदा हमारे भीतर विद्यमान होना चाहिए। आमतौर पर अपनी अनेकों कमीयों के कारण हम जीवन में सुतुष्ट नहीं होते, परन्तु प्रभु कृपा से हम जीवित हैं। हम रोग मुक्त हैं। सुबह उठते ही सूर्य की कृपा से नया दिन उजागर हुआ है। इस सब के लिए आभार प्रगट करने का हमने कभी सोचा ही नहीं। मेरे पैरों का जूता मुझे आरामदेह यात्रा का भाव देता है। सर्दी में गर्म कपड़े, गर्मी में ए.सी की ठण्डक आदि। माता पिता जिनके कारण हम हैं, गुरूजन जिनकी कृपा से हमें अक्षर बोध हुआ, स्नेही और संबंधी, समाज जिनके बिना जीवन ही संभव ना होता, सब आभार के पात्र हैं। जिन्दगी भर सुख हो, दुख हो आभारी होना, ईश्वर की कृपा है।
  2. केवल आज के लिए मैं चिंता नहीं करूंगाः- चिंता जीवन के सब उपदरों की जड़ है। आज के समाजिक प्रीपेक्ष में तनाव मुक्त होना एक असंभव सी बात है। ‘‘चिंता तां की कीजिये जो अनहोनी होये, एह मार्ग संसार को, नानक थिर नहीं कोई।।’’ जब कुछ स्थिर ही नहीं (सब जग चलनहार) तो चिंता क्यों। हर वस्तु चलायेमान है (प्द ं ेजंजम व िसिनग) कुछ भी स्थिर नहीं, फिर भी हम सभी राजा हो या रंक चिंता के शिंकजे में हैं। यही कारण है कि हम शारीरिक या आत्मिक स्तर पर रोग ग्रसत हैं। यह भी एक सत्य है कि जितने लोग काल-भय और चिंता से बिमार होकर मरते हैं उतने किसी और कारणों से नहीं। आज समाज में जितनी भी समस्यायें हैं उसका कारण चिंता ही है। व्यक्ति की, समाज की, गाँव की, नगर की, प्रांत की, देश की, सबकी अलग अलग परिस्थितियां हैं और अनेकों अनेक चिंतायें हैं। चिंता से मुक्ती के कुछ विचारः ऽ भय के कारण चिंता होती है। भय को पहचानीये और अपने से पूछीये कि किस बात को लेकर आप चिंताग्रसत हैं। ऽ भय काल्पनिक भी होते हैं। ऐसी घटनाओं के बारे में ही सोचते रहने से जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं होता। ऽ आप की जो भी समस्या है उसको लिख डालीये और समस्या के बारे में सभी तथ्य एकत्र कीजिये। ऽ अपनी समस्या के बारे में दूसरों से बात करें। अनुभवी व्यक्ति से अपने विचारों का आदान-प्रदान करें। किसी विशेषज्ञ की सलाह लें। ऽ समस्याओं के संभावी हल, जो भी हों, उन में से सबसे उत्तम का पालन करें। ऽ व्यस्त रहीये। दूसरों के दुखों के बारे में सोचें और आप पायेंगें कि आप की समस्या तो कुछ भी नहीं। रेकी की शरण में आएं, मुक्त भाव से रेकी करेंगें तो आपको बिल्कुल निराशा नहीं होगी। हमारी चिंता या तो भविष्य के बारे या तो फिर हमारी भूत की घटनाओं के प्रती होती है भाव हम अपने वर्तमान को भूल कर आगे की या पीछे की सोचते हैं और चिंता का कारण बनते हैं। अभिप्राय यह कि हमारी चिंता हमारी अपनी ही पैदा की हुई होती है।  प्रमुख नियम को ध्यान में रखें ईश्वर कभी गल्ती नहीं करता तो चिंता क्यों और किस लिए! 3. केवल आज के लिए मैं क्रोध नहीं करूंगांः- अरस्तु ने कहा हैः ‘‘क्रोध किसी को भी आ सकता है, यह सहज वृत्ति है परन्तु क्रोध ठीक समय पर, ठीक कारण के लिए, ठीक ढंग से और ठीक हद तक आये, यह हर किसी के बस में नहीं और ना ही ऐसा होना सुगम है।  गीता- ‘‘क्रोध, लोभ और भटकना यह तीनों आत्मा को नर्क के द्वार तक ले जाती हैं, इस लिए इन तीनों का प्रीत्याग करो।’’ ‘‘क्रोध के आते ही इसके दुष्परिणामों के बारे में सोचें, क्रोध ठण्डा हो जायेगा’’ कनफियुसीयस यदि आप अपने क्रोध पर काबू नहीं पा सकते तो यह उसी तरह का व्यवहार होगा जैसे एक चालक का अपने शक्तिशाली स्वःचलित वाहन पर नहीं होता। क्रोध हमें शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और अध्यात्मिक स्तर पर, हर तरह से हानि पहुंचाता है, फिर भी हम क्रोध से मुक्ती नहीं पा सकते। हम क्रोध से पूरी तरह मुक्ती पा सके ऐसा तो संभव नहीं है, हाँ क्रोध को कम करने के ढंग तरीकों के बारे में बात की जा सकती है। कुछ उपाय इस प्रकार हो सकते हैंः- ऽ गांठ बांध लें कि क्रोध से आज तक किसी भी समस्या का हल नहीं हुआ, उल्टा समस्या और उलझन बढ़ी जरूर हैं। ऽ क्रोध आते ही ईश्वर का नाम लें। अगर आप नास्तिक हैं तो 50 से 1 की उल्टी गिणती करें। ऽ एक गिलास ठण्डा पानी पी लें और एकांत में चले जायें और सोचें कि गुस्सा क्यों आया था। ऽ बाद के पछतावे से कुछ नहीं सवरेगा इस लिए पहले इस प्रति विचार करें। ऽ क्रोध क्यों आता है, इस प्रति कारणों के बारे में विचार करके उन कारणों को लिख लें और भविष्य में उन कारणों से छुूटकारा पाने की कोशिश करें। ऽ क्रोध एक ऐसा अवेग है जिसके आते ही कुछ पल के लिए बुद्धी मन्द पड़ जाती है। आवेग में भूख प्यास मर जाती है, रक्त-चाप (ठसववक च्तमेेनतम) बढ़ जाता है या फिर इससे भी बुरे व्यवहार का दिखावा हो सकता है। ऽ किसी दूसरे के साथ, अपने क्रोध के बारे में अपने विचार सांझें करें। ऽ अपनी मुट्ठीयों को इतने जोर से बंद करें कि नाखून आपकी हथेली में चुभ जायें। ऽ क्रोध के आते ही अपने श्वास पर ध्यान ले जायें और आते जाते श्वासों की गिणती करें। ये बात विचारने की है कि यदि क्रोध पर काबू ना रखा जाये तो इसके दुष्परिणाम बहुत ही गंभीर हो सकते हैं। रेकी के इस नियम का पालन करना सबके हित में होगा।
  3. केवल आज के लिए मैं अपने माता-पिता, गुरूजनों (अध्यापकों) और बड़ों/बजुर्गों का सत्किार करूंगाः- अपने माता पिता और बड़े जनों के प्रति आदर भाव रखना हमारे समाज का अभिन्न अंग है। यह निःस्वार्थ प्रेम का प्रदर्शन भी है। रेकी में स्वार्थ का कोई स्थान नहीं है। मूल भाव यह कि सभी परीपूर्ण ब्रह्मांडीय ऊर्जा का अंश है अतः सभी के प्रति आदर भाव रखना एक ईश्वरीय गुण है। एक रेकी साधक के लिए ये जरूरी है कि वह अपने जीवन को प्रेमपूर्ण बनाये और जब वह किसी को रेकी दे तो उसके स्पर्श में ब्रह्मांडीय ऊर्जा का संचार हो। ष्भ्वदवनत जीम ळनतन! भ्म ींे ैीवूद ने जीम ूंल जव चमतमिबजपवदण्ष् सिकन्दर महान ने अपने गुरू की बात अनसुनी कर, दरिया को पार कर लिया, उपरान्त अरस्तु ने इसका कारण पूछा तो सिकन्दर ने उत्तर दिया कि संसार में और अनेकों सिकन्दर हो सकते हैं। परन्तु अरस्तु (गुरू) कोई और नहीं होगा। गुरबाणी में एक वाक्य है ‘‘ज्ञान अन्जन गुर दीया अज्ञान अन्धेर बिनास।।’’ गुरू सदा ही उस मार्ग की ओर संकेत करता है जो और कहीं नहीं, प्रकाश की तरफ ले जाता है। बड़े बजुर्गों का जीवन हमारे लिए प्रेरणा स्रोत इस लिए होता हैं कि उनके जीवन से हमें सदा प्रेरणा का बोध होता है। उन का आदर करना ही हमारा कत्र्वय है।
  4. केवल आज के लिए मैं अपनी जीविका ईमानदारी से अर्जित करूंगाः- बेईमानी, मिलावट, घूसखोरी और भ्रष्टाचार से की हुई कमाई, हमारे विचार और बुद्धी को पहले भ्रष्ट करती है तभी हम ऐसा व्यवहार करने की ओर प्रेरित होते हैं। कम से कम समय में अधिक से अधिक कमाई करनी आज के समाज का एक सधारण नियम है। ईमानदार होना सिर्फ सत्य बोलना और सच्चाई के रास्ते पर चल कर ठीक काम करना ही नहीं ब्लकि ये है कि हमारी भावना भी इससे जुड़ी हुई हो अर्थात हम कोई काम ऐसा ना करें जिसे हम भावनात्मक स्तर पर ठीक नहीं मानते या समझते। रेकी ईश्वरीय रूप में हमारा साथ निभाती है, मानसिक और भावनात्मक स्तर पर कभी भी ईमानदारी का पल्लु नहीं छोड़ना चाहिए। रेकी के इन पांच नियमों को अपने जीवन में उतारने से जो लाभ हो सकते हैं, कुछ इस प्रकार हैंः- ऽ जब हमारी दिनचर्या इन पाँच नियमों के अनुसार ढलेगी तो हमारी जीवनशैली अधिक स्तेज और सुन्दर होगी। ऽ जीवन की प्राप्तियों का संतोषजनक लाभ इन नियमों का पालन करने से ही मिलेगा। ऽ इस प्रकार हमारे जीवन में अप्रिय बदलाव कम-से-कम होगा। खुशी और संतुष्टता के मौके अक्सर आयेंगें। हम सभी इस प्रकार की जिन्दगी की कामना करते हैं। इन नियमों का अनुकरण करने से हमारे जीवन में बुनियादी बदलाव आयेगा और हम मानसिक और भावनात्मक स्तर की चरम-सीमा पर होंगें। रेकी के अभ्यास में हमें कुछ भावों को छोड़ना चाहिए, इससे हमारी उपचार शैली को ठीक दिशा निर्देष मिलेगाः
    1. अपने आपको कभी डाक्टर ना समझें।
    2. यह भाव लेकर ना चलें कि मैं रेकी देता हूँ ब्लकि यह भावना प्रदर्शित करें कि यहां रेकी ।अंपसंइसम है।
    3. किसी दूसरे को जबरदस्ती रेकी उपचार ना दें।
    4. रेकी को ऐसे ही नहीं बांटना या देना। ऊर्जा के आदान-प्रदान का ध्यान रखें।
    5. रेकी उपचार के बाद जो अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं हमेशा उनके बारे में सोचते रहें अर्थात परिणामों में जुड़े नहीं (मानसिक स्तर पर अनभिज्ञ रहें)।

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