यंत्र

रेखा गणित के हिसाब में जब हम कोई भी आकार, आकृति या डिजाईन बना कर उसको अपने भावों में जोड़ देते हैं तो ऐसे रेखा चित्र, प्रतीक (सिंबल) या यंत्र आदि कहलाते हैं। उदाहरण के लिए सबसे अधिक प्रयोग में लाये जाने वाला एक ऐसा प्रतीक ‘‘स्वास्तिक’’ है। इस प्रतीक का व्यवसायिक दुनिया में एक विशेष स्थान है, अर्थात शुभ लाभ का। इन प्रतीकों की बनावट या तो घड़ी की उल्टी चाल या सीधी दिशा (।दजप ब्सवबा.ॅपेम वत ब्सवबाूपेम) में होती है। जब हम इन रेखा चित्रों को देखते हैं तो हमारे अन्दर तुरन्त खास तरह की भावनायें उमिंगित होती हैं, हम तुरन्त इस आकृति से जुड़ जाते हैं, हमारा अवचेतन मन उस तरह की ऊर्जित तरंगें प्रगट करता है और हम समझने लगते हैं कि यह एक मंगलकारी प्रतीक है, इसमें से मंगल ही मंगल होगा। जब हम जोड़ ($) के लाल प्रतीक को सफेद रंग की गाड़ीयों पर बना देखते हैं तो हमारी भावनायें हमें उसके बारे में अवगत कराती हैं कि यह त्मक ब्तवेे की गाड़ी है इससे हम सेवा की भावना से अवगत होते हैं। इसी तरह नाज़ीओं (हिटलर) का उल्टा स्वास्तिक हमें घृणा का भाव देता है। यह एक दिलचस्प टिप्पणी होगी कि ऐसे सारे प्रतीक, यंत्र, देवी-देवताओं के चित्र मनुष्य ने अपनी अलग अलग विचार धाराओं के अनुकूल बनाये हैं तो ये मानव से अधिक शक्तिशाली कैसे हुए। देवी लक्ष्मी, चण्डी, सरस्वती, गदा धारी, धनूषधारी, इन देवी देवताओं से हमारी भावनायें धन, दुष्टों का विनास, संगीत ललित कलायें शिक्षा, हनुमान, रामचन्द्र (मर्यादा) से जुड़ी हुई है। इन देवी देवताओं के चित्र देखते ही हमारे मन में तुरन्त वैसी ही भावनायें जागृत हो जाती हैं। हमारे जितने भी देवी देवता हैं वह सभी विभिन्न प्राकृतिक ऊर्जाओं के प्रतीक हैं। हर देवी देवता किसी एक ऊर्जा का प्रतीक है। संसार में अनेक प्रकार की ऊर्जायें हैं, इस लिए अनेक प्रकार के देवी देवताओं का निर्माण हुआ, जैसे अग्नि, वायु, मेघ (इन्द्र) आदि। जैसे भारत माता सचमुच में नहीं है लेकिन सम्पूर्ण भारत की अभिव्यक्ति एक दुर्गा की तरह खड़ी देवी, भारत का प्रतीक बन जाती हैं। सम्पूर्ण प्राकृति दो ऊर्जाओं से संचालित है, इनका संतुलन बना रहना जरूरी है। शिव-शक्ति कोई वास्तविक स्त्री-पुरूष नहीं, यह धन-ऋण ऊर्जाओं के प्रतीक हैं। चीन में इन्हें यीन-यांग (ल्पद.ल्ंदह) ऊर्जा कहते हैं। प्रकृति सकरात्मकता-नकरात्मकता (च्वेपजपअम.छमहंजपअम) का प्रति रूप है, इनके संतुलन को हम अर्ध-नारीश्वर कहते हैं। शक्ति चुंकि स्त्री लिंग है इस लिए दुर्गा का प्रतिरूप हमारे सामने है। बात अंत में ये कि हमारे देवी देवता आदि सभी उर्जाओं को रूपमान करते हैं। हम लक्ष्मी के चित्र से विद्या की कामना नहीं कर सकते। जिस प्रकार का भाव हम अपने अन्दर रखते हैं ठीक वैसे ही भावों की तरंगों के साथ हम ब्रह्मांड से जुड़ जाते हैं, वैसे ही भावों की तरंगें हमारी ओर आकर्षित होती है। यह प्राकृति का स्वाभाविक आकर्षण-विलक्षण नियम है। इसी तरह श्री यंत्र है। इसके 108 त्रिकोण होते हैं जो सश्कत नींव का सूचक और ऊपर की तरफ बढ़ते रहने की प्रेरणा है। जब तक हमारी भावनायें तरंगित होकर हमारी कामनाओं को प्रतिरूप कर इस श्री यंत्र से नहीं जुड़ती, समृद्धी प्राप्त नहीं होगी। यही हाल दूसरे, तरह तरह के यंत्रों का है, कुबेर यंत्र, काली यंत्र, नारायण यंत्र आदि अजीबो गरीब रेखा चित्र, गणित के कई ढंगों से निर्मित किये गये चकौर खानों में लिखे अंक आदिः- 50 57 2 7 8 1 2 7 मनोरथ सिद्धी यंत्र 6 3 52 52 6 3 12 11 56 51 8 51 14 9 8 9 4 5 52 55 4 19 10 5 व्यापार में लाभ का यंत्र 12 5 10 7 9 11 प्रसवकारी यंत्र 8 13 6
जैसे रैड कॅरास या स्वास्तिक को देख कर हम उसके अर्थ का बोध प्राप्त कर लेते हैं वैसे ही इन प्रतीकों को देखते ही हमारे मन की भाव तरंगें ऊर्जित होती हैं और हमारे अवचेतन मन को प्रेरित करती हैं।
निष्कर्ष यह है कि हम इस गोपनीय किस्म की विद्या (यदि यह विद्या है तो) से अनभिज्ञ रहे हैं, कुछ लोगों को छोड़ कर ये यंत्र, तंत्र, मंत्र काल्पनिक भय को निर्मित करते हैं और हमारे अन्दर वैसी ही ऊर्जा को तरंगित करते हैं, इस लिए हम इस की और आकर्षित होते हैं, और आश्चर्य चकित होते हैं। इन मंत्र, तंत्रों पर प्राचीनता का ठॅप्पा लगा कर भी पेश किया जाता है क्योंकि हम प्राचीनता से बहुत जल्दी और बहुत अधिक प्रभावित होते हैं।
ऐसे ही और ढंग तरीकों से हमारे सामने इस डर को खड़ा कर दिया जाता रहा है। हम सब जानते हैं कि आज का मानव अपेक्षाकृत बहुत जागरूक है और अनेकों प्रकार से विकसित हुआ है, पर मनोविज्ञानिक भय का सदा ही शिकार रहा है, अब भी है और रहेगा भी। परिस्थितियां जो जटिल होती जा रही हैं।
मंत्रः जब कोई विचार हमें किसी विशेष प्रकार से प्रभावित करता है तो उसी प्रकार की ऊर्जित तरंगें हमारे अन्दर भाव पैदा करती है। शरीर से एक एक तरंग हमारे आभा मण्डल में परत-दर-परत शक्तिशाली चुम्बकीय प्रभाव का निर्माण करती है, उसी तरह की तरंगें ब्रह्मंमांड से हमारी ओर आती हैं (आकर्षित होती हैं)। ये क्रिया (स्पाम ।जजतंबजे स्पाम) के सिंद्धांत के अनुसार होती है। जब हम एक भाव की तरगों का अपने आभा मण्डल में चुम्बकीय निर्माण करते हैं तो उसी भाव की ब्रह्मांडीय तरंगें अपनी तरफ आकर्षित करते हैं। उदाहरण के तौर पर जैसे हमारे बोलते ही हमारी वाणी टेप-रिकार्डर में टेप हो जाती है। वैसे ही हमारे द्वारा निर्मित हर तरंग आकाशीय रिकार्ड में दर्ज हो जाती है। कोई भी ध्वनिय तरंग कभी नष्ट नहीं होती, पैदा होते ही ये अकाशीय रिकार्ड में छप जाती है और इसका असर लगातार जारी रहता है। भाषा ओर भाव: हम सब जानते हैं कि भाषा हमारे भावों की वाहक है या मध्यम है जिस के द्वारा हमारे भाव मुखर होते हैं और दूसरों तक पहुंचते हैं। हम समझते हैं कि संस्कृत भाषा में बोले गये शब्द ही मंत्र हैं। ऐसा नहीं है। भाषा का मंत्र से कोई लेना देना नहीं है। हमारा प्राचीन प्रमुख साहित्य संस्कृत, पाली या ऐसी ही लुप्त होने की कगार पर पहुँची भाषाओं में ही है, हमारे भाव, उदगार, प्रार्थनायें आदि इन्हीं भाषाओं में हमारे तक उपलब्ध हुए है। जिस ज्ञान से हम अनभिज्ञ हैं वह हमारे लिए रहस्यमयी होता है। जो लोग उस रहस्य को जानते होते हैं उससे जायज या नाजायज लाभ उठाते हैं। मंत्रों का रहस्य भी इसी प्रकार है। एक मंत्र हैः ‘‘सर्वे भंवतु सुखीनः, सर्वे सन्तु निरामय’’ भाव ये कि सब लोग सुखी हो, सब लोग स्वस्थ हों। इस मंत्र में क्या रहस्य है। आज भी बजुर्ग लोग इस तरह का आर्शिवाद देते हैं। ‘‘पत्नि मनोरमां देही मनोवृतनुसारिनीम्’’ एक साधारण युवक की मनोकामना है। हे ईश्वर मुझे सुन्दर पत्नी जो मेरे मनोवृत्ति के अनुकूल हो, देने की कृपा करें। यह भी प्रचार किया जाता है कि हमारे प्राचीन ग्रंथों मेें गूड़ रहस्य छुपें हैं और ऐसे मंत्र हैं जो हमें सब प्रकार की व्याधीयों से मुक्ति दिलवा सकते हैं। ऐसा कुछ भी नहीं है। हमारे शास्त्रों में से पहली किस्म के ग्रन्थ हैं, जहां से हमें सर्वोत्तम जीवन कैसे जिया जाये ऐसे नियमों की जानकारी प्राप्त होनी है। ये ग्रन्थ है, उपनिषद, गीता, आदि ग्रन्थ आदि। दूसरी तरह के ग्रन्थों में ईश्वर के प्रति आभार, प्रशंसा, भावनायें और काल्पनिक उड़ानों से अभीभूत साहित्य है। संस्कृत भाषा में है, फिर कविता में है, जिन्हें कुछ जानने वाले लोग लय-बद्ध स्वर में गाते या पढ़ते हैं और हमें सुना कर आनन्दित करते हैं। तीसरी तरह के ग्रन्थ हैं वेद, शास्त्र जिन में हमारी मनोकामनाओं, संसारिक मांगों को अभिव्यक्त किया गया है, जैसेः- ‘‘रूपंदेही, धनदेही यशोदेही, दिषोयहि’’ हे ईश्वर! मुझे सुन्दरता, धन, यश, प्रदान करना। ‘‘शरद शतंजीवेस’’ हे ईश्वर! मेरी सौ साल तक आयु हो। इसका मतलब ये नहीं कि शास्त्र गल्त हैं। ये साहित्य अति उत्तम है, अनुपम है परन्तु हमारी अज्ञानता, अन्धविश्वास दुखदायी है। निष्कर्ष यही है कि यह केवल भावनायें हैं, अनुभव है, सार है। मंत्र यदि संस्कृत में ही पढ़ा या गाया जाये तो ही काम करेगा ऐसा नहीं है। जादुयी शक्तियों, भावनाओं में होती है, शब्दों या भाषाओं में नहीं हैं। बीज मंत्र का आजकल बड़ा चलन है। यह भी कुछ नहीं है ब्लकि लम्बें मंत्र को छोटा करके पढ़ा या गाया जाता है। जैसे अंग्रेजी में प्दजमदेपअम ब्ंतम न्दपज को प्ण्ब्ण्न् कह देते हैं वैसे ही बीज मंत्र भी बनाये जाते हैं। लय-बद्ध गाये जाते हैं ताकि प्रभावशाली महसूस हो। मंत्रों को जपने का भी ढंग होता है भावों का होना बहुत जरूरी है। इस विषय को कितना भी लम्बा खींचा जा सकता है यहां विषय पर थोड़ी ही रोशनी डाली गयी है। साधारण भाषा में अपनी भावनाओं को प्रगट करने के लिए अपना मंत्र बनायें और उसी भावना से उसका श्रद्धा पूर्ण जाप करें। परिणाम आश्चर्यजनक होगा। ध्यान और एकाग्रता यही सब में बड़ा मंत्र है। क्या आप महार्षि वाल्मिकी को भूल गयें हैं जिन्होनें ‘‘मरा मरा’’ जपते ब्रह्य-ज्ञान की प्राप्ती की और महार्षि हुए।

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