चुम्बकी ऊर्जा

एक सिद्धांत जिसकी हम सबको जानकारी है वह यह है कि विशेष तरह की ऊर्जा तथा कम्पन अपनी तरह की ऊर्जा को अपनी ओर आकर्षित करती है (स्पाम ंजजंतंबजे स्पाम)। यही स्थिति सभी विचारों तथा भावनाओं की है, क्योंकि विचार तथा भावनायें ऊर्जा ही हैं। जैसे हम किसी व्यक्ति में बारे सोचते हैं, संयोंग वश हमारी मुलाकात उस व्यक्ति से हो जाती है आदि इस तरह की अनेक उदाहरणें हमें मिल सकती हैं। विचार से ही आकार बनतें हैंः- विचार एक हल्की, गतिशील तथा चंचल ऊर्जा है। ठोस पदार्थों के विरूद्ध यह ऊर्जा अपने आपको तुरंत प्रगट करती है। एक कलाकार का विचार ही उसकी आकृति को रूपमान करता है। भवन को बनाने से पहले उसका नक्शा तैयार किया जाता है। हमारे मन के अन्दर का विचार बाद में भौतिक रूप बनता है। भौतिक ऊर्जा, विचार ऊर्जा की ओर आकर्षित होकर एक आकृति में उतरता है। एक समान ऊर्जायें एक दुसरे की तरफ खिंच कर तथा कला में परिवर्तित होकर सामने आती हैं। विकीर्ण तथा आकर्षणः अणु के कुआंटम सिद्धांत के अनुसार जो ब्रह्मांड या संसार हम देखते हैं वही हमारे पास वापिस प्रतिबिम्बत होता है। जब हम नकारात्मक विचारों को पनपने देते हैं तो हमारी परिस्थितियें नकारात्मकता में रूपमान होती हैं भाव यह नकारात्मक विचार नकारात्मकता की ओर ही खिंचता है। ठीक इसके विपरीत सकारात्मकता सुख तथा खुशी को ही जन्म देती है। रचनात्मक मानसदर्शन (अपेनंसप्रंजपवद) सकारात्मक विचार रखने से ही बात नहीं बनती, अपितु आधारभूत दृष्टिकोण को ढूंढ कर उसको बदलना पड़ेगा। इस स्तर पर अपेनंसप्रंजपवद हमारा काम करती है। इस प्रक्रिया से हम उन कारणों को जान सकते हैं जिनके कारण हमारा रचनात्मक विकास रूका हुआ है। जिस समय हमें हमारी नकारात्मक कमजोरियों का पता चल जाता है तो हम ऐसे दृष्टिकोण को रचनात्मक मानस दर्शन से समाप्त करके, स्वभाविक सुख, शांति, प्रेम तथा सम्पूर्णता की प्राप्ति की ओर चल पड़तें हैं। हम अपने विशेष उद्देश्यों की पूर्ती के लिए समय-बद्ध मानसदर्शन आरम्भ कर सकते हैं। समय के साथ साथ प्रवीणता से यह हमारे विचारमुखी होने का हिस्सा भी बन सकता है। प्रभावशाली मानसदर्शन
  1. इस दिशा में पहले हमें अपना लक्ष्य निर्धारित करना पड़ेगा। यह लक्ष्य ऐसे हो सकते हैं जैसे सवास्थ नौकरी, घर एवं सुखों सम्बंधी खुश रहने की प्रविृती आदि। छोटे तथा सहज ही प्राप्त हाने वाले लक्ष्यों को आधार बना कर हम अपेनंसप्रंजपवद की प्रक्रिया को आरम्भ कर सकते हैं। यह इस लिए आवश्यक है ताकि इस काम का ज्ञान-बोध आसान तथा सरल हो तथा हमें संतोष की अनुभूती हो। समय के साथ हमारी इस क्षेत्र में परिपक्ता बढ़ेगी, बाद में कठिन तथा चुनौती पूर्ण विषय के लक्ष्य भी सोच सकेंगें।
  2. स्पष्ट विचार की कल्पना करना तथा इसको मानस-पटल पर रेखांकिक करने से हम इस कल्पना की बारीकियों का नक्शा बना सकते हैं। इस मानस-चिन्तन से जब हम विचारक सांझ की सृजणा करेगें तो इसकी पूर्ती सहज होगी।
  3. हम एकान्त में हों या दिन भर की सहज अवस्था में कल्पना को ध्यान में रखना चाहिए। इस तरह यह हमारे अस्तित्व का हिस्स बन जायेगा। इस के लिए बहुत शक्ति या कठोर ध्यान की जरूरत नहीं। इस साधना में सहजता तथा रूचि का होना जरूरी है। तनाव तथा कठोरता से तो काम बिगड़ सकता है।
  4. जब हम ऐसा विचार बना लेते हैं जिस की पूर्ती हम चाहते हैं तो हमारे विचार सकारात्मक एवं उत्साही होने चाहिए। अपने आप को यह सन्देश देते रहना है कि यह काम हुआ कि अभी हुआ। हमारा ऐसा विचार ही एक संकल्प है। इस तरह के संकल्प की प्राप्ति के लिए सम्भावित कठिनायियों का मूल ही बनने नहीं देना चाहिए (छपच जीम मअपस पद ठनक)। यह अनुभव करना है कि यह संकल्प अर्थ-भरपूर है तथा सम्भव है। जब तक संकल्प पूरा नहीं होता, इस लक्ष्य की प्राप्ति तक ऐसा करना अनिवार्य है। इस प्रक्रिया के बीच हमारा विचार बदल भी सकता है, जो कि प्राकृतिक और स्वभाविक है। जिस विषय के बारे में हमारी दिलचस्पी बहुत गहरी ना रहे तो ऐसे संकल्प की प्राप्ति के लिए अधिक प्रयास न करें तथा सामथर््य में रहें। सम्पूर्ण प्रक्रिया पर फिर से विचार कर सकते है। यदि हम समझते हैं कि लक्ष्य हमारे लिए महत्वपूर्ण नहीं रहे तो हमें इस तथ्य को पूरी सूझ-बूझ से स्वीकार कर लेना चाहिए। समझने वाली बात यह है कि हम अपने आप को असफल ना माने, ब्लकि हमारा उद्देश्य अच्छे लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बदल गया है। इस लिए परेशान होने की जरूरत नहीं। जिस समय हमारा संकल्प पूरा हो जाता है तथा लक्ष्य सफल हो जाता है तो अपने आप को मुबारक तथा शाबाशी देना बिल्कुल ना भूलो, ब्रह्मांडीय सर्व-शक्तिशाली ऊर्जा का (ईश्वर) धन्यवाद करना कभी ना भूलो।

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