कुण्डिलिनी

प्रत्येक व्यक्ति के मेरूदण्ड अन्दर सुष्मना नाड़ी में सात चक्र होते हैं। सिर के पिछले भाग से लेकर सुष्मना के नीचे तक यह चक्र हैंः
  1. सहस्त्रार चक्र ब्तवूद ब्ींातं
  2. आज्ञा चक्र ज्ीपतक मलम ब्ींातं
  3. विशुद्धी चक्र ज्ीतवंज ब्ींातं
  4. अनाहत चक्र भ्मंतज ब्ींातं
  5. मणीपुर चक्र ैवसंत ब्ींातं
  6. स्वाधिष्ठान चक्र ैंबतंस ब्ींातं
  7. मूलाधार चक्र त्ववज ब्ींातं मूलाधार चक्र पर कुण्डिलिनी का वास है, जो 3) कुण्डल मार कर सोयी हुई सर्पनी है। इसको रेकी साधना, ध्यान (डमकपजंजपवद) या प्राणयाम से जगाते हैं। इस तरह यह जागृत हो जाती है। सहस्त्रार चक्र पर पहुंचने से साधक की समाधी लग जाती है तथा वह योग सिद्धी को प्राप्त करता है। यह अभ्यास किसी सिद्ध गुरू की निगरानी में किया जाना चाहिए वर्ना हानि की पूरी संभावना होती है। रेकी के नियमित प्रयोग से कोई भी कुण्डिलिनी को जागृत करने की क्षमता रखता है। यह एक वास्तविकता है कि जो शक्ति नीचे के चक्र (भोजन एवं काम) में ही उपयोग होती है, से मानसिक तथा आत्मिक शक्तियों को जागृत करने की संभावना भी बनाई जा सकती है।
रेकी का इतिहास रेकी का इतिहास

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